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खूबसूरत यादें

गायत्री के देवर की शादी थी  ।घर में खुशियों का माहौल था  ।चहल पहल  खी-खी , खा खा हर जगह का लगा हुआ था । अमन भी खुश था  की गायत्री सारी जिम्मेदारियों को बहुत अच्छे से निभा रही है  ।घर की बड़ी बहू जो ठहरी  । हल्दी वाले दिन  सारी  भाभियों ने मिलकर देवर की खिंचाई शुरू की।  देवर ने  शैतानी के शब्दों में कहा " मेरी छोड़ो मेरा तो जो है सो है, लेकिन आप लोगों   की शैतानियां पूछता हूं ।"  हां बताएं आप लोगों ने बचपन में क्या-क्या किया और उसका असर कभी आपके जीवन पर हुआ कि नहीं, चलो सब अपने अपने दिल की पोल खोलो  गेम की शुरुआत सासू मां से हुई। सासु मां इस खेल में बहुत खुश थी उन्होंने भी अपनी 2-4 किस्से कहानी सुनाएं  कि कैसे बचपन में शैतानियां करके सब को परेशान करती थी ।   अब गायत्री की बारी आई क्योंकि भाभियों में वही बड़ी भाभी थी । उन्होंने कहना शुरू किया   मेरे बचपन का एक किस्सा बहुत  याद आता   मैं दसवीं कक्षा में थी स्कूल जाने के लिए बस से जाना होता था। बस स्टॉप पर बहुत सारे घर थे लेकिन ए...

15 साल बाद

  कविता की शादी को 15 साल हो गए थे ।उसे  हर किसी की पसंद ना पसंद के बारे मे सब पता होता, सुई से लेकर  कोई भी बड़ी चीज हो  कहां है ,उसको सब पता था। मां जी को कब चाय चाहिए ,बाबूजी को कब अखबार चाहिए, पति का सारा सामान, कौन सी फाइल कहां रखी है, बच्चों को क्या, कब ,कैसे, कहां उसने ध्यान रखा ,लेकिन कभी उससे किसी ने उसकी चाहत नहीं पूछी कि  उसको क्या पसंद है क्या नहीं पसंद । एक बार प्रफुल्ल के स्कूल में   वार्षिक महोत्सव के दिन माता पिता व दादा दादी दोनों  की प्रतियोगिता हुई, जिसमें माता-पिता को दादा दादी की पसंद- नापसंद बताना था और दादा दादी को माता-पिता की।  जब कविता का नंबर आया न तो मोहन, ना उसके मां बाप किसी को भी कविता की पसंद के  बारे में कुछ पता था।  जब कविता से सब के बारे में पूछा गया तो उसने चींटी से लेकर  पहाड़ तक की बातें बता डाली । प्रतियोगिता में कविता का परिवार हार गया क्योंकि उसके परिवार वालों को उसकी पसंद ना पसंद के बारे पता ही नहीं था । प्रफुल्ल ने घर पहुंच कर जब दादा दादी और पापा से यह बात पूछी कि मेरी मां को आ...

प्रेरणा

जीवन में प्रेरणा का स्रोत तो कहीं से भी मिल सकता है चाहे वह रेत रेत ,हो चींटी, हो या खुद मनुष्य ही ,क्यों ना हो, मगर मेरी प्रेरणा का स्रोत एक ऐसी महिला थी ,जिसे मैं जानती भी नहीं थी ,पहचानते भी नहीं थी, मगर उसके कार्य करने की क्षमता ने मुझे अंदर तक हिला डाला।   रमा यह सोच ही ही रही थी कि तभी  उसकी बेटी  अधीरा ने उसका हाथ पकड़ा मां जरा रोटी बना दो भूख लग रही है । मां ने कहा हा हा  बनाती हूं  ।अरे मैं तो आज  खाना बनाना ही भूल गई, कितनी गहराई में चली गई थी। रामा ने जल्दी-जल्दी खाना बनाया और अधीरा को दिया । उसने अपनी डायरी में अपने जीवन के कुछ ऐसे पल सजोये हुए थे  जिनमें  उसने अपनी प्रेरणा के स्रोत के बारे में लिखा हुआ था। एक पल वह था जिसमें एक कूड़ा बीनने वाली महिला जो उसे सवेरे 6:00 बजे से कूड़ा उठाती दिखती  और रात के 5:00 बजे तक पूरे गली मोहल्लों की सफाई करते हुए । उसको कहीं ना कहीं दिख जाती । निरंतर कार्य करती रहती और कहां रमा घर के काम में दिलमिला जाती । अरे घर का काम करो ,फिर स्कूल जाओ ,फिर स्कूल का काम करो ,फिर घर आओ, ...

काश मैं एक मोबाइल एक मोबाइल होता

काश में एक मोबाइल होता तो चिपका रहता मां के कानों से मां करती मुझसे घंटों बातेंइधर उधर की उसकी साड़ी ,उसका सूट ,मेरी ज्वेलरी ,की मिसेज शर्मा, मिसेज वर्मा, मिसेज कटारिया  की काश में एक मोबाइल  होता तो बनता पापा का सारा ऑफिस कभी यह फाइल  खोलो , तो कभी वह फाइल  खोलो उसको मेल डालो ,उसकी मेल पढ़ो करता यह सब  काम काश मैं  एक मोबाइल होता   तो दादू की चर्चाओं का हिस्सा होता मोदी जी ने  क्या अब नया किया ,कांग्रेस उनसे जलती है शिवसेना को क्या हुआ ,जो वह लोगों पर उबलती है किया  सही या गलत ,अमित शाह ने राम मंदिर बन कर कर रहेगा अब तो मेरी अयोध्या में काश मैं एक मोबाइल होता तो दादी की जानकारी होता क्या दवा खाने से ,क्या  मर्ज सही होता कौन से घरेलू उपचार से घुटने की पीड़ा दूर होती, यह सब  उनको बताता देता काश में एक एक मोबाइल होता तो दीदी का दोस्त होता करता बातें पूरे दिन की उनसे यहां वहां की वह भी खुश  हो चेक करती मुझे, व्हाट्सएप फेसबुक और इंस्टाग्राम की तरह  बार बार काश में एक मोबाइल होता दिया ...