जीवन में प्रेरणा का स्रोत तो कहीं से भी मिल सकता है चाहे वह रेत रेत ,हो चींटी, हो या खुद मनुष्य ही ,क्यों ना हो, मगर मेरी प्रेरणा का स्रोत एक ऐसी महिला थी ,जिसे मैं जानती भी नहीं थी ,पहचानते भी नहीं थी, मगर उसके कार्य करने की क्षमता ने मुझे अंदर तक हिला डाला। रमा यह सोच ही ही रही थी कि तभी उसकी बेटी अधीरा ने उसका हाथ पकड़ा मां जरा रोटी बना दो भूख लग रही है । मां ने कहा हा हा बनाती हूं ।अरे मैं तो आज खाना बनाना ही भूल गई, कितनी गहराई में चली गई थी। रामा ने जल्दी-जल्दी खाना बनाया और अधीरा को दिया । उसने अपनी डायरी में अपने जीवन के कुछ ऐसे पल सजोये हुए थे जिनमें उसने अपनी प्रेरणा के स्रोत के बारे में लिखा हुआ था। एक पल वह था जिसमें एक कूड़ा बीनने वाली महिला जो उसे सवेरे 6:00 बजे से कूड़ा उठाती दिखती और रात के 5:00 बजे तक पूरे गली मोहल्लों की सफाई करते हुए । उसको कहीं ना कहीं दिख जाती । निरंतर कार्य करती रहती और कहां रमा घर के काम में दिलमिला जाती । अरे घर का काम करो ,फिर स्कूल जाओ ,फिर स्कूल का काम करो ,फिर घर आओ, ...
गायत्री के देवर की शादी थी ।घर में खुशियों का माहौल था ।चहल पहल खी-खी , खा खा हर जगह का लगा हुआ था । अमन भी खुश था की गायत्री सारी जिम्मेदारियों को बहुत अच्छे से निभा रही है ।घर की बड़ी बहू जो ठहरी । हल्दी वाले दिन सारी भाभियों ने मिलकर देवर की खिंचाई शुरू की। देवर ने शैतानी के शब्दों में कहा " मेरी छोड़ो मेरा तो जो है सो है, लेकिन आप लोगों की शैतानियां पूछता हूं ।" हां बताएं आप लोगों ने बचपन में क्या-क्या किया और उसका असर कभी आपके जीवन पर हुआ कि नहीं, चलो सब अपने अपने दिल की पोल खोलो गेम की शुरुआत सासू मां से हुई। सासु मां इस खेल में बहुत खुश थी उन्होंने भी अपनी 2-4 किस्से कहानी सुनाएं कि कैसे बचपन में शैतानियां करके सब को परेशान करती थी । अब गायत्री की बारी आई क्योंकि भाभियों में वही बड़ी भाभी थी । उन्होंने कहना शुरू किया मेरे बचपन का एक किस्सा बहुत याद आता मैं दसवीं कक्षा में थी स्कूल जाने के लिए बस से जाना होता था। बस स्टॉप पर बहुत सारे घर थे लेकिन ए...
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